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सोमवार से पितर: जानिए पितृपक्ष के बारे में

सोमवार से पितृपक्ष, जिसे महालय व गरू दिन भी कहते हैं की शुरुआत हो गयी। 15 दिनों तक पूर्वजों का सम्मान सहित पूजन-अर्चन करना चाहिए। इन दिनों में किये जाने वाले तर्पण से पितर को मोक्ष की प्राप्ति और घर-परिवार में सुख सम्पदा का प्रवाह। शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के लिए तीन ऋण कहे गये हैं। देव, ऋषि और पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक होता है क्योंकि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्यता और सुख-सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिए अनेक जतन किये, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निर्थक होता है। वर्ष में एक बार श्राद्ध सम्पन्न करने और कौवा, कुत्ता, गाय को ग्रास निकाल कर ब्राह्मणों को भोजन कराने मात्र से ही यह ऋण कम हो जाता है। इस बार सोमवार का दिन होने के साथ ही चूड़ामणि योग और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र पड़ रहा है। इस दौरान देव लोक पृवी लोक के नजदीक आ जाता है।

सोमवार से पितर: जानिए पितृपक्ष के बारे में
सोमवार से पितर: जानिए पितृपक्ष के बारे में
इस पक्ष में मृतक पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। पूरे पक्ष में शुभ कार्य अथवा नये कपड़ों की खरीदारी नहीं की जाती। ब्राह्मणपुराण में लिखा है कि आश्विनी मास के कृष्ण पक्ष में यमराज यमपुरी से पितरों को मुक्त कर देते हैं और वे अपनी संतानों तथा वंशजों से पिंडदान लेने के लिए धरती पर आ जाते हैं। सिंह और कन्या के सूर्य में पितृलोक धरती के अत्यधिक नजदीक होता है। इसलिए अश्वनी मास के कृष्ण पक्ष का नाम ‘कनागत’ पड़ गया है।

श्राद्ध से तात्पर्य: पितृपक्ष में देवताओं को जल देने के पश्चात मृतकों के नामों का उच्चारण करके उन्हें भी जल देना चाहिए। गया में श्राद्ध करने का बड़ा महत्व माना गया है। इस पक्ष में अपने पूर्वजों को याद करने और उनकी मृत्यु की तिथि को उनका श्राद्ध करने की परम्परा वैदिक काल से चली आ रही है।

श्राद्ध का अधिकार: श्राद्ध करने का पहला अधिकार ज्येष्ठ पुत्र को है। इनके जीवित न रहने पर अथवा ज्येष्ठ पुत्र की आज्ञा से छोटा पुत्र श्राद्ध कर सकता है। अगर मृतक के सभी पुत्र अलग-अलग निवास करते हैं तो सभी पुत्रों को श्राद्ध करना चाहिए। पुत्र के जीवित न होने की स्थिति में पौत्र, इन दोनों के जीवित न होने की स्थिति में प्रपौत्र को श्राद्ध करना चाहिए। मृतक के पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र न हो अथवा जीवित न हों तो ऐसी स्थिति में मृतक की पुत्री श्राद्ध कर सकती है। अगर वह भी न हो तो भतीजा श्राद्ध कर सकता है।

मृतक की पुत्रवधू भी श्राद्ध कर सकती है। अगर किसी स्त्री के पुत्र न हो तो वह स्वयं भी अपने पति का श्राद्ध कर सकती है। अगर उपुर्यक्त में से कोई न हो तो बहन भी श्राद्ध कर सकती है। बहन के न होने पर बहन का पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है। मृतक का अगर कोई वंशज न हो और न ही सपिण्ड न ही सोदक हों तो उस देश के राजा द्वारा दाह संस्कार एवं श्राद्ध करने का विधान पुराणों में दिया गया है।

किस दिन किसका करें श्राद्ध : पूर्णिमा और प्रतिपदा का श्राद्ध 28 सितम्बर, द्वितीया का श्राद्ध 29 को, तृतीया का 30 को, चतुर्थी का 1 अक्टूबर को, पंचमी का श्राद्ध 2 अक्टूबर को, षष्ठी का 3 को, सप्तमी का 4 को, अष्टमी का 5 को, नवमी का 6 को, दशमी का 7 को, एकादशी का 8 को, द्वादशी का 9 को, त्रयोदशी का 10 को, चतुर्दशी का 11 को और अमवास्या का श्राद्ध 12 अक्टूबर को होगा।

भरणी का श्राद्ध 1 अक्टूबर को, कृतिका का श्राद्ध 2 अक्टूबर को, सौभाग्यवतियों का श्राद्ध 6 अक्टूबर, संन्यासियों का श्राद्ध 9 अक्टूबर को, मघा का 9 को श्राद्ध होगा। विष और शस्त्र से मारे गये लोगों का श्राद्ध 11 को होगा। सर्वपितृ श्राद्ध 12 को और मातामही का श्राद्ध भी 12 अक्टूबर को किया जायेगा।

समापन में मिल रहा सोमवती अमावस्या का योग : इस बार पितृपक्ष की शुरुआत में चंद्र ग्रहण और समापन में सोमवती अमावस्या का योग है। महिला कर्मकाण्डी रामरतिजी बताती हैं कि सोमवार सुबह 6:37 बजे से खग्रास चंद्र ग्रहण प्रारंभ होगा, जो भारत में सुबह 6:42 बजे तक देखा जायेगा। भारत के पश्चिमी राज्यों में राजस्थान और गुजरात में पांच मिनट के कालखंड में देखा जायेगा।

ग्रहण का सूतक 27 सितम्बर को सायं 6:37 बजे से शुरू हो जायेगा, जो 28 सितम्बर को सुबह 6:42 बजे तक रहेगा। यह ग्रहण उत्तराभाद्रपद नक्षत्र और मीन राशि पर होगा। वहीं, पितृ पक्ष का समापन 12 अक्टूबर को सोमवती अमावस्या पर हो रहा है। अर्थात चंद्रवार (सोमवार) से शुरू होकर पितृ पक्ष का समापन चंद्रवार को होगा।