Home » राष्ट्रीय समाचार » अंबेडकर बैंक में रखे पैसे जैसे!

अंबेडकर बैंक में रखे पैसे जैसे!

भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती पर उनकी विरासत को लेकर एक जंग छिड़ी हुई है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां उनकी उपलब्धियों पर अपना दावा जता रही हैं.
समूहों के बीच केवल संपत्ति और पेटेंट के सवाल पर ही लड़ाई नहीं लड़ी जाती, बल्कि विरासत भी एक मुद्दा होता है. विरासत केवल अतीत पर दावेदारी भर की बात नहीं है.

इसमें आने वाले कल के लिए एक आहट भी सुनी जा सकती है. जब कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियां किसी राजनेता पर दावेदारी कर रही हों तो उनकी नज़र उस राजनेता के विचारों और सरोकारों पर होती है.
पढ़ें विस्तार से

ऐसा लगता है जैसे हितों की राजनीति को बड़े गहरे तरीके से साधा जा रहा है क्योंकि बीता कल इतना क़ीमती है कि उसे आज की तारीख़ में वोटों में बदला जा सकता है.
(पढ़ेंः दलित राजनीति खंड-खंड)
नेहरू परिवार के लिए दीवानी सी रही कांग्रेस और संघ की टापू सरीखी शाखाओं के बाहर सपना देख रही बीजेपी के लिए अंबेडकर एक संकेत हैं.
वे दूसरे तबकों को अपने संगठन से जोड़ने की योजना पर पहले से अधिक तेज़ी से काम कर रहे हैं. उनकी कोशिश लोकतांत्रिक प्रतीकों पर अधिकार जताने की सियासी होड़ कही जा सकती है.
लेकिन विरासत को लेकर जब भी लड़ाईयां लड़ी जाती हैं, दांव हमेशा गुजर रहे आज पर लगा होता है. और कई बार मुश्किलें भी खड़ी होती हैं.
संविधान की विरासत

आज जब कोई समूह गांधी या आज़ाद या नेहरू या अंबेडकर की विरासत पर दावा करते हैं तो उनका दावा विचारों पर नहीं होता. ऐसे संगठनों का रवैया कुछ ऐसा होता है, मानो वे किसी जायदाद पर हक़ जता रहे हों.
(पढ़ेंः क्या हाशिये पर हैं दलित)
विरासत एक प्रतीकात्मक संपत्ति की तरह ही है. अंबेडकर पर आज दावा करने का ये मतलब है कि एक समुदाय के तौर पर दलितों पर दावा करना. यह संविधान की विरासत पर भी दावा करने जैसा है.
यह इंसाफ़़ के इतिहास पर दावा करना है. वे पार्टियां जिनके पास उपलब्धियों के नाम पर बताने के लिए कुछ नहीं है, वे किसी के विचार को तो हथिया ही सकती हैं.
यह एक तरह की बौद्धिक किस्म की चोरी कही जा सकती है मानो किसी और की खूबियों को कोई और अगवा करने पर अमादा हो.
रस्म अदायगी

और इस पूरी क़वायद के तौर तरीके बेहद दिलचस्प हैं. ज्यों ज्यों 125वीं सालगिरह की तारीख करीब आ रही है, जयंती समारोहों के शोर शराबे में सुधारों की आवाज़ गुम होती दिख रही है.

आरएसएस के लिए अंबेडकर एक राष्ट्रवादी होंगे. कांग्रेस भी अपनी पारंपरिक रस्म अदायगी करेगी.
हालांकि अंबेडकर दिवस के मौके पर सक्रिय होने वाले अनुसूचित जाति विभाग के नौकरशाहों की जगह अब राजनेता ले लेंगे.
पोस्टर छापना, पर्ची बांटना, इतिहास फिर से लिखना सभी पार्टियों को अपनी सुविधा के हिसाब से पसंद आता है.
इतिहास की अपने मुताबिक़ व्याख्या करने की आदत अब हर पार्टी में देखी जा सकती है. हालात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
नई छवि!

राहुल गांधी अंबेडर को अपने परिवार के समर्थक के तौर पर पेश करंगे. मोहन भागवत उन्हें शाखा के एक आकांक्षी सदस्य के रूप में देखेंगे.

अंबेडकर जो गांव और जाति के सवाल पर बेहद मुखर हुआ करते थे, अब उन्हें अधिक स्वीकार्य चेहरे के तौर पर पेश किए जाने की कोशिश होगी.
एक व्यक्ति के तौर पर अंबेडकर की नई छवि दिलचस्प हो सकती है, लेकिन राजनीतिक तौर पर उतनी हो खोखली भी होगी.
उनके क्रांतिकारी विचारों के नापसंद किए जा सकने वाले हिस्सों को कांट-छांट कर पसंद किए जाने लायक बनाया जाएगा. यह पूरी कवायद उनकी विरासत को हथियाने की कोशिश भर नहीं है, बल्कि उसे धोखे से बर्बाद करना भी है.
गांधी और नेहरू

ये आश्चर्यजनक ही है कि न तो कभी कांग्रेस ने और न ही बीजेपी ने अंबेडकर की परवाह की. यह उनका दलित आंदोलन ही था कि वे राष्ट्रीय फलक पर एक कद्दावर शख़्सियत के तौर पर उभरे.

आज अंबेडकर को याद किए जाने का प्रतीकात्मक महत्व भी है. उनका नाम गांधी और नेहरू की क़तार में लिया जाता था. अंबेडकर पर दावा जताने का मतलब होता है कि उस आदमी के अधूरे कामों पर दावा करना.
कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही उन पर हक़ जता रही हैं. इसलिए नहीं कि वे उनका बहुत आदर करती हैं बल्कि इसलिए कि दोनों ही दलों में प्रतीकात्म चीजों का सहारा लेने की ज़बर्दस्त प्रवृति है.
दोनों ही राष्ट्रवादी होने का दावा करते हैं. दोनों ही जनता से खुद को जोड़ना चाहते हैं. इस लिहाज से अंबेडकर एक प्रतीकात्मक शक्ति के रूप में दोनों की ही गारंटी देते हैं. उनका जीवन आधुनिकता, बराबरी और न्याय का उदाहरण है.
राजनीतिक अहमियत

दो बौद्धिक रूप से कंगाल पार्टियों के लिए अंबेडकर बैंक में रखे पैसे की तरह हैं. लेकिन निराश होने की भी वजहे हैं. अंबेडकर का जुड़ाव सामान्य बुद्धिजीवी तबके से रहा है.
उन्हें बीजेपी या कांग्रेस के ब्रांड की तरह पेश करने से उनकी विरासत को कमज़ोर कर देने का ख़तरा है. इस कोशिश के पीछे अगड़ी जातियों के कुछ समूह हैं.
अंबेडकर को हथियाने का मतलब उनकी विरासत को कमज़ोर करना है. इस कोशिश में उनकी राजनीतिक अहमियत को नुकसान पहुंचाया जा रहा है.
दुख की बात ये है कि दोनों ही पार्टियों ने अंबेडकर को अनाथ छोड़ दिया था. गांधी के साथ उनके संबंधों की वजह से अंबेडकर को लेकर कांग्रेस हमेशा से दुविधा की स्थिति में रही है.
पटेल की विरासत

बीजेपी जानती है कि अंबेडकर गोलवलकर और सावरकर से कोसों दूर हैं. इसके बावजूद भी दोनों पार्टियां मौजूदा हालात में ये समझती हैं कि अंबेडकर का मतलब बराबरी और इंसाफ़ का सपना है.
जो हम देख पा रहे हैं कि पहले कांग्रेस और बीजेपी ने पटेल की विरासत पर लड़ाई लड़ी और उनकी शख़्सियत को तार-तार कर दिया.
अंबेडकर दूसरे प्रतीक पुरुष हैं जिनकों लेकर दोनों पार्टियां संघर्ष कर रही हैं. दोनों एक दूसरे पर लापरवाही बरतने के आरोप लगा रही हैं.
इसके साथ ही दोनों ही पार्टियां चुनावी राजनीति के दोहरेपन को भी दिखा रही हैं.
जातीय समीकरणों की बाज़ीगरी दिखलाने वाले राजनीतिक दल उस आदमी की विरासत पर बेक़रारी के साथ दावा कर रहे हैं जिन्होंने जाति के सर्वनाश की बात कही थी.
भारतीय राजनीति

मालूम पड़ता है कि अंबेडकर के विचारों को अपनाने की बजाय उनका शुद्धिकरण किया जा रहा है.
यह मौजूदा भारतीय राजनीति की त्रासदी ही कही जा सकती है कि अंबेडकर के क्रांतिकारी विचारों को अपनाने की बजाय उन्हें अपनी पसंद के मुताबिक पेश किया जा रहा है.
मार्क्स ने कहा था कि, “इतिहास खुद को दोहराता है. पहली बार एक त्रासदी के रूप में, दूसरी बार एक तमाशे के तौर पर.”
भारत के राजनीतिक दल भी इतिहास का दोहराव कर रहे हैं. पहली बार एक नाटक के तौर पर दूसरी बार बेतुके तमाशे के तौर पर.
इसे मौजूदा भारतीय राजनीति का एक दुखद मोड़ कहा जा सकता है

source BBC

Check Also

भारत का सबसे लम्‍बें पुल का प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने किया उद्घाटन

प्रधानमंत्री ने ब्रह्म पुत्र नदी पर बने ढोला-सदिया पुल का उद्घाटन किया, कहा – पूर्वोत्‍तर …