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फिल्म समीक्षा: कैलेंडर गर्ल्स

नामी निर्देशक का नाम उसके कुछ खास फिल्मों की वजहों से खुद ब खुद बढ़ जाती है। मधुर भंडारकर का नाम भी एक ऐसे निर्देशक के रूप में दर्शकों के मस्तिस्क में हमेशा रहता है। ये उनकी फिल्म ‘कैलेंडर गर्ल्स’ देख कर लगता है

फिल्म समीक्षा: कैलेंडर गर्ल्स
फिल्म समीक्षा: कैलेंडर गर्ल्स

कि दर्शकों को उन्हें इस कैज से आजाद कर देना चाहिये, क्योंकि उन्हें एक एक बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है। इसके लिए जरूरी नहीं है कि वह अपने स्टाइल की फिल्मों से समझौता कर लें, बल्कि हो सके तो इस ‘स्टाइल’ के प्रति अपना नजरिया बदल लें। क्योंकि उनकी ये नई फिल्म उनकी कुछ पुरानी फिल्मों का ही रूपांतरण लगती है। ‘पेज 3’, ‘फैशन’ और ‘हीरोइन’ सरीखी मधुर की फिल्मों का कॉकटेल है ‘कैलेंडर गर्ल्स’। वो कैसे आइये बताते हैं।

एक नामी कंपनी के बेहद ग्लैमरस कैलेंडर से फिल्म-मॉडलिंग की दुनिया को देश के अलग-अलग कोने से नंदिता मेनन (आकांशा पुरी), परोमा घोष (अवनि मोदी), शेरॉन पिंटो (क्यारा दत्त) और मयूरी चौहान (रूही सिंह) जैसी मॉडल्स मिली हैं। इनके साथ पाकिस्तान से आयी नाजनीन (सतपुड़ा पाइन) भी है, जो अपने प्रेम को ‘कुछ करके’ दिखाना चाहती है। ‘कुछ करके’ दिखाने की चाह परोमा घोष को भी है, जो अपने दादा, पिता और भाई के ताने सुन सुनकर यहां आयी है। कैलेंडर गर्ल बनने के बाद किसी को फिल्मों में काम मिल जाता है तो किसी मॉडलिंग में, लेकिन नाजनीन के हाथों से एक फिल्म आते आते इसलिए रह जाती है क्योंकि वह पाकिस्तान से आयी है। गुजारे के लिए उसे हाई क्लास एस्कोर्ट के नाम पर जिस्मफरोशी के धंधे में उतरना पड़ता है। एक दिन परोमा अपने एक पूर्व प्रेमी के साथ एक पार्टी में जाती है, जहां उसकी पहचान कुछ क्रिकेटरों से होती है। यहां से उसकी जिंदगी ही बदल जाती है। वह बैटिंग की दुनिया में पहुंच जाती है और अपे प्रेमी संग करोड़ों कमाती है।

मयूरी को घर खरीदना है इसलिए वो एक फिल्म साइन कर लेती है, जिससे उसे डेढ़ करोड़ रुपये मिलते हैं। लेकिन इन सबसे अलग रहती है शेरॉन जो मॉडलिंग की चमक दमक से दूर पत्रकारिता में अपना करियर बनाती है। सब ठीक ही चल रहा होता है कि एक दिन परोमा और नाजनीन पर बिजली गिरती है और इनकी जिंदगी नरक बन जाती है। जानजीन की मौत हो जाती है और परोमा जेल पहुंच जाती है।
बहुत सारे वादों-इरादों के साथ आयी मधुर भंडारकर की ये फिल्म सच्चाई के न तो करीब लगती है और न ही कोई चौंकाने वाली बात कहती है। कैलेंडर गर्ल्स की जिंदगी को यह छूकर-सी निकल जाती है और हाथ कुछ नहीं लगता। उन्होंने वो तमाम बातें दोहराई है, जिन्हें वह अपनी पूर्व फिल्मों में दिखा चुके हैं। मसलन, पेज 3 पार्टीज में क्या होता है, हाई सोसाइटी का खोखलापन, नकली मुस्कान वाले लोग, क्रिकेट और बॉलीवुड का रिश्ता, समझौते के नाम पर जिस्मफरोशी वगैराह वगैराह। इस फिल्म में कुछ नया है तो वे पांच तारिकाएं, जिन्हें इस फिल्म से लांच किया गया है। मधुर तो अपनी फिल्मों में नए चेहरों को पहले भी मौका देते आये हैं, लेकिन कम से कम कलाकार तो होते थे। यहां तो पूरी फौज के बावजूद किसी का अभिनय प्रभावित ही नहीं करता। ये फिल्म एक फैशन परेड की तरह लगती है, जिसमें कम कपड़े और सिर्फ कम कपड़ों की नुमाइश है। शायद इसीलिए इस फिल्म के पहले प्रोमो-ट्रेलर को सेंसर से काफी फटकार लगी थी।

वो बात तो जो शुरु में कही गयी कि मधुर का नाम एक ऐसे निर्देशक के रूप में लोगों को याद है, जो अनछुए पहलुओं पर कुछ कहने की ताकत रखते हैं और उनकी मारक क्षमता भी अच्छी है। लेकिन ये फिल्म कहीं भी किसी भी एंगल से प्रभावित नहीं करती। फिल्म में मयूरी का किरदार ऐसा हो, जो थोड़ा बहुत नएपन के साथ कुछेक पलों के लिए बांधे रखता है। बाकी तो सब सिर से परे गुजरता है।

रेटिंग : 2.0 स्टार
कलाकार: आकांशा पुरी, अवनी मोदी, रूही सिंह, क्यारा दत्त, सतपुड़ा पाइन, कीथ स्क्वेरिया, मीता वशिष्ठ, रोहित राय, रुशाद राणा
निर्देशन: मधुर भंडारकर
निर्माता: संगीता अहीर, मधुर भंडारकर
गीत: कुमार
संगीत: मीत ब्रॉस. अंजान, अमाल मलिक

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