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फिल्म रिव्यू: प्रेम रतन धन पायो

प्रेम रतन धन पायो नाम को केवल प्रेम भी किया जा सकता था। वो इसलिए कि जब सलमान खान स्क्रीन पर हों और उनके किरदार का नाम प्रेम हो तो कुछ कहने-समझने की जरूरत ही नहीं है।

फिल्म रिव्यू: प्रेम रतन धन पायो
फिल्म रिव्यू: प्रेम रतन धन पायो
रेटिंग: दो १/2 स्टार
उनका ये किरदार किस तरह से और किन वजहों से प्रसिद्ध है, इसे दोबारा से क्या बयां किया जाए। प्रेम में सबकुछ निहित है। कई बार तो ऐसा लगता है कि फीलगुड फैक्टर से सजा ये प्रेम नेकी और अच्छाइयों का वो टोकरा है, जिसे ढोना हर इंसान के बस की बात नहीं। पता नहीं क्यों, मगर ये बजरंगी का रिश्तेदार-सा भी लगता है, जो अपना नाम-पता बदल कर फिर से दर्शकों के बीच आ गया है।

फिल्म की कहानी शुरू होती है मथुरा-वृंदावन के रहने वाले प्रेम दिलवाले (सलमान खान) की प्रेमलीला से। दरअसल, ये प्रेमलीला, प्रेम के स्टाइल की रामलीला है, जो कम संसाधनों के बावजूद राम भरोसे चल ही रही है। यहां मनचलों की नो एंट्री है। प्रेम उन्हें बाहर खदेड़ देता है। प्रेम की अच्छाइयों का परिचय यहीं से शुरू होता है। यहां से होने वाली थोड़ी-बहुत कमाई को वह एक उपहार नामक संस्था को भेंट करना चाहता है, जिसकी कर्ता-धर्ता है राजकुमारी मैथिली (सोनम कपूर)। मैथिली की प्रीतमपुर के युवराज विजय (सलमान खान) के साथ राजतिलक के बाद शादी होने वाली है। राजतिलक समारोह में भाग लेने के लिए मैथिली को प्रीतमपुर आना है। ये बात जब प्रेम को पता चलती है तो वो अपने लंगोटिये यार कन्हैया (दीपक डोबरियाल) के साथ प्रीतमपुर जाने का प्रोग्राम बनाता है।

इसी बीच विजय पर जानलेवा हमला होता है। वह मौत के द्वार पर है। तभी अचानक राजमहल के सुरक्षा प्रमुख संजय (दीपराज राणा) की नजर प्रेम पर पड़ती है। प्रेम और विजय को हमशक्ल पाकर वह चौंक जाता है और किसी तरह से वह प्रेम को अपने साथ एक गुप्त स्थान पर ले आता है।

संजय ये सारी बात रियासत के दीवान (अनुपम खेर) को बताता है। दीवान, युवराज विजय की जान का हवाला देकर प्रेम को कुछ दिनों के लिए युवराज बनने के लिए राजी कर लेता है। दरअसल, ये सारी साजिश विजय के अपने सगे भाई अजय (नील नितिन मुकेश) ने अपने एस्टेट के सीईओ चिराग सिंह (अरमान कोहली) के साथ मिल कर रची थी।

उधर, प्रीतमपुर आने के बाद प्रेम, विजय बनकर मैथिली से मिलता है और उसे मन ही मन चाहने लगता है। जल्द ही उसे राजमहल के बारे में कई बातें पता चलती हैं। ये भी कि यहां दो भाइयों के अलावा चंद्रिका (स्वरा भास्कर) और राधिका (आशिका भाटिया) नामक दो बहनें भी हैं, जिन्हें बरसों से राजमहल से दूर रखा गया है। महल से उनकी इस दूरी का कारण जब उसे पता चलता है तो वो उन्हें वापस लाने की कसम खाता है। इधर, मैथिली उसके और नजदीक आने लगती है। पर तभी कुछ ऐसा होता है, जिससे सब हिल जाते हैं।

इस कहानी में कितनी जान है, अब तक तो आप समझ ही गये होंगे। पता नहीं लोगों को ये कितनी अपील करेगी। फिल्मी लहजे में कहें तो ये एक चर्चित पर बहुतेरी बार आजमाई हुई फार्मूला आधारित कहानी है। इस पर राजश्री बैनर और खासतौर से सूरज बड़जात्या की निर्देशकीय शैली इसे और आर्दशवादी बना देती है। फिल्म में सबकुछ अच्छा अच्छा है और जो अच्छा नहीं है, वो अंत में अच्छा बन जाता है। ये सब देख कर अच्छा तो लगता है, पर विश्वसनीय कम लगता है।

प्रेम का किरदार इतना आर्दशवादी है कि दिल करता है कि अब बस इस इनसान के कहीं दर्शन ही हो जाएं। सलमान की उम्र बढ़ती गई और स्टारडम आसमान छूता गया. प्रेम कहीं पीछे छूट गया और चुलबुल पांडे और बजरंगी जैसे किरदारों ने उसकी जगह ले ली, लेकिन ये सब एक फिल्म और मनोरंजन तक ही सीमित दिखता है। सिनेमाई आकर्षण की तरह। इसलिए ये कहानी भी, जिसे रासजी लबादे में मलाई मार-मार कर लपेटा गया है, पारिवारिक कम और सिनेमाई ज्यादा लगती है।

फिर भी एक सुपरस्टार का आकर्षण आपको पूरी फिल्म में बांधे रखता है। सलमान खान, जो अब लगभग अपनी हर फिल्म में एक खास अंदाज के लिए जाने जाते हैं, के करिश्मा की वजह से आप लट्टू-से हुए रहते हैं। उनकी कॉमेडी, हाव-भाव, हंसी-मजाक वगैरह वगैरह… यहां कई बार वह सूरज की शैली पर भी हावी दिखते हैं। ये फिल्म उत्सव-जश्न के मौके पर आई है। सो, इसका कलेवर भी वैसा ही है। राजसी लुक, चकाचौंध, थिरकन पैदा करता संगीत, आंखों को सुहाते दृश्य और बिना की खून-खराबे वाला ‘दि एंड’। सूरज ने इसे अपनी पिछली फिल्मों से और अधिक भव्य बनाया है।
सेट भव्य हैं। अच्छे लगते हैं। पर लेखन में बारीकी और गंभीरता, साथ में रोचकता की भी कमी दिखती है। करीब पौने तीन घंटे की इस फिल्म में और भी बहुत कुछ है, जो उलझनें पैदा करता है। कभी-कभी बोर भी करती है, लगता है कि सूरज जैसे निर्देशक इस चीज को या इस बात को इतने हल्के में कैसे ले सकते हैं, कैसे दिखा सकते हैं। जहां एक परिवार की कहानी की बात है तो ये कहानी भावनात्मक पटल पर कमजोर लगती है। इमोशंस एक स्तर तक पहुंचते पहुंचते कहीं रुक से जाते हैं। शायद किसी चीज की कमी के अहसास की वजह से।

सलमान पूरी फिल्म में छाए रहे, पर उनका कोई नया काम इसमें नहीं दिखता। सोनम के लिए बार-बार लगा कि उनकी जगह कोई और भी हो सकता था। शायद यही बेहतर भी होता। स्वरा भास्कर और दीपक डोबरियाल अच्छे कलाकार हैं, लेकिन उनका पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ। नील और अरमान एक बड़े मौके को भुनाने में फिर से चूकते दिखे। अनुपम खेर जमे हैं।
कुल मिलाकर ये सलमान की बस एक और फिल्म ही है, जिसमें वो सब है, जो उनकी इससे पहले की फिल्मो में भी रहा है। चूंकि ये फिल्म खुशी के माहौल में आई है तो एक बार तो देखना बनता ही है।

सितारे : सलमान खान, सोनम कपूर, अनुपम खेर, स्वरा भास्कर, दीपक डोबरियाल, अरमान कोहली, नील नितिन मुकेश, दीपराज राणा, आशिका भाटिया, सुहासिनि मूले, संजय मिश्रा
निर्देशक, कहानी-पटकथा : सूरज आऱ बड़जात्या
निर्माता : अजित कुमार बड़जात्या, कमल कुमार बड़जात्या, राजकुमार बड़जात्या
संगीत : हिमेश रेशमिया, संजय चौधरी
गीत : इरशाद कामिल

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