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जीत के प्रकार अनेक – दिल्ली ७० सीटें और परिणाम ६७ आप, ३ भाजपा, 0 कान्ग्रेस और 0 अन्य

कितना कुछ और हो सकता अगर ऐसा होता या वैसा, पर हुआ सब कुछ हुआ फेल! सिर्फ जनता हुई पास दिल्ली में विधान सभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की धमाकेदार जीत 70 में से 67 सीटें जीत मिली है, ५०% से ज्यादा वोट हासिल किया, सभी वर्गों और जातियों का वोट मिलने से ही इतनी बड़ी जीत को हम सकारात्मक जीत कह सकते हैं

Arvind Kejriwal

हर्षवर्धन, विजय गोयल, जगदीश मुखी, विजेन्द्र गुप्ता, विजय कुमार मल्होत्रा जैसे दिल्ली के पुराने नेताओं को दरकिनार करना पड़ा बहुत मंहगा
प्रभात झा, निर्मला सीतारमन, राजीव प्रताप डूडी नेताओं के भरोसे की जीत बदली बड़ी हार में बीजेपी अगर संघ के स्थानीय नेताओं की राय पर भी टिकट बांटती, बीजेपी अगर दलबदलुओं को आसमान पर नहीं बैठाती, बीजेपी ने अगर इस कदर नकारात्मक प्रचार नहीं किया होता तो वो सम्मानजनक स्थिति में हो सकती थी

बीजेपी अगर पिछले साल लोकसभा चुनावों के बाद अपने ७ सांसदों को ग्राउंड लेवॅल में अपने-अपने संसदीय क्षेत्र का रिपोर्ट कार्ड के साथ कुछ एक्शन प्लान अपने क्षेत्र के विकास के लिए किय गया होता तो जनता को विश्वास में लेना आसान होता या कि महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ दिल्ली का चुनाव करवा देती, बीजेपी अगर डा हर्षवर्धन को लोकसभा का चुनाव नहीं लड़वा कर दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आजाद छोड़ देती, बीजेपी अगर अंतिम समय में किरन बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करके पूरे चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल करती तो चुनाव जीतने के मौके बहुत ज्यादा बढ़ सकते थे

अमित शाह ने यूं तो सांसदों, मंत्रियों की फौज मैदान में उतारी लेकिन अगर एक बार वो यह भी देख लेते कि फौज मैदान में कर क्या रही है, उनका चुनाव प्रचार कैसा चल रहा है और किन इलाकों में कैसी प्रतिक्रिया मिल रही है तो वो अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर हो जाते जो बीजेपी के फायदे में ही होती।

उन्हे वहां कोई नहीं पहचानता , यानि वोटर के साथ कोई संवाद नहीं, यहां तक कि पार्टी के उम्मीदवार तक से कोई संवाद नहीं।

एक बीजेपी कार्यकर्ता का कहना था कि उनके यहां कांग्रेस से आए नेता को टिकट दे दिया गया, अब भला दो दिन पहले पार्टी में आए नेता से वो कैसे जुड़ सकते थे. उनके अपने पुराने बीजेपी नेता ही जब अनमने भाव से पैराशूट उम्मीदवार का साथ दे रहे थे तो ऐसे में घर में बैठना ही ठीक लगा।

यह कुछ ऐसे उदाहरण है जो बताने के लिए काफी हैं कि बीजेपी ने ही बीजेपी को हरा दिया, नीचे के स्तर पर यह हो रहा था तो उपर के स्तर पर खुद प्रधानमंत्री नकारात्मक प्रचार को बड़वा दे रहे रहे थे. कभी केजरीवाल को नक्सली कर रहे थे तो कभी अराजक. द्वारका की सभा में तो मोदी ने पेट्रोल डीजल की घटती कीमतों को लेकर खुद को नसीबवाला बताया और अपील कर डाली कि बदनसीब ( केजरीवाल ) को वोट देने की जरुरत क्या है।
बाकी के बीजेपी नेता भी केजरीवाल को कीड़ा, बंदर, मदारी, चोर, हरामखोर, हरामजादा, झूठा, भगोड़ा बता रहे थे. सब से सब केजरीवाल की 49 दिन की सरकार को तो पानी पी पी कर कोस रहे थे लेकिन यह नहीं बता रहे थे कि आठ महीने के राष्ट्रपति शासन (परोक्ष रुप से केन्द्र सरकार) के दौरान दिल्ली की जनता के लिए क्या क्या भले के काम किए गये।

उधर केजरीवाल मुफ्त पानी, मुफ्त व्हाई फाई, आधे दाम पर बिजली की बात करते रहे और 49 दिनों में बंद हो गयी रिश्वतखोरी की याद दिलाते रहे. इसका कोई तोड़ बीजेपी के पास नहीं था. उसने तोड़ निकालने की कोशिश भी नहीं की.

बीजेपी ने चुनावों से दो दिन पहले अखबारों को दिए पूरे पेज के विज्ञापन में मोदी सरकार के आठ महीनों की उपलब्धियों को बखान किया, यह भी वोटर को भ्रम में ही डालने वाला रहा।

सबसे बड़ी गलती तो किरन बेदी को आखिरी वक्त में पार्टी में लाने और मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की रही, अगर ऐसा न किया होता तो पार्टी एक होती, सभी नेता यह सोचकर पूरी मेहनत करते कि पता नहीं उनपर ही मोदी की नजर पड़ जाए , वैश्य समाज भी नहीं बंटता, इस समाज के कुछ व्यापारियों का कहना था कि बेदी के नाम की घोषणा के साथ ही साफ हो गया था कि अब तो उनके समाज को कोई मुख्यमंत्री बन नहीं सकता तो एक वर्ग केजरीवाल के साथ चला गया जो खुद वैश्य समाज से ही आते हैं।

खुद को मुख्यमंत्री रेस मे समझने वाले नेता भी आफ रिकार्ड कहते थे कि हम क्या दर्री बिछाने और कुर्सियां लगाने के लिए ही बने हैं. कल के लोगों को महत्व दिया जा रहा है, ऐसे कैसे चलेगा, यही लोग जीत गये तो फिर हमें तो कोई पूछेगा ही नहीं।